Monday, January 04, 2010

तीसरा अध्याय - नारियों के लिए चौंसठ कलाएं

यौन विज्ञान की अज्ञानतासे विवाहित एवं अविवाहित दोनों ही भटक जाते हैं। यौन शिक्षा के अभाव में नर नारी दोनों ही गुमराह हो जाते हैं, अनेक प्रकार के अप्राकृतिक कार्यों में संलग्न होकर काम (सेक्स) के प्रति विकृत धारणाओं में उलझ जाते हैं और अपने जीवन को स्वयं ही विषाक्त बना डालते हैं। आज चारों ओर यौन शिक्षा की आवश्यक्ता एवं अनिवार्यता का महत्व स्वीकारा जा रहा है। यौन शास्त्र की सही जानकारी न होने के कारण नवयुवक अनेक कुटेवों के शिकार हो जाते हैं। यौन शिक्षा वर्जित होने के कारण ही यौन अपराधों में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

महर्षि वात्स्यायन के काल में भी यौन शिक्षा वर्जित थी। नारियों को यौन शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था। यौन क्रीड़ा के बारे में सोचना अथवा चर्चा करना एक अपराध था, पाप था। जब स्वयं पुरुष वर्ग ही यौन शिक्षा से वंचित था, तब स्त्रियों के लिए यौन शिक्षा की कल्पना करना भी संभव नहीं था। जन-मानस यह सोच भी नहीं सकता था कि नारियों को यौन शिक्षा की अनुमति अथवा छूट दी जाए। तत्कालीन समाज में स्त्रियों को शास्त्र का अध्ययन मनन करने की अनुमति नहीं थी। फिर कामशास्त्र के अध्ययन अथवा शिक्षा का प्रश्न ही कहां उठता?

परन्तु महर्षि के विचार क्रान्तिकारी एवं धनात्मक (Positive) थे। उन्होंने स्त्रियों को यौन शिक्षा देने की सपष्ट अनुशंसा की। वे जानते थे कि नारी ही गृहस्थ जीवन की कर्णधार है और सुखी दाम्पत्य जीवन एवं सम्पन्नता के लिए उसे भी अपने पति के समान ही यौन शास्त्र में पारंगत होना चाहिए। उनके क्रान्तिकारी विचारों का रूढ़िवादियों ने प्रबल विरोध किया परन्तु महर्षि ने आलोचनाओं तथा विरोधों के बावजूद नारियों के लिए यौन शिक्षा का महत्व एवं अनिवार्यता निर्भीक होकर प्रतिपादित की। उन्होंने अत्यन्त स्पष्ट रूप से इस बात की अनुशंसा की कि कामशास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष को व्यवहार में लाने का उन्हें भी उतना ही अधिकार है जितना कि पुरुष वर्ग को। सैद्धांतिक पक्ष को व्यवहारिक रूप देने के लिए कामशास्त्र का अध्ययन आवश्यक भी है और अनिवार्य भी। संभोग का वास्तविक अर्थ है समान रूप से आनन्द का उपभोग और यह तभी संभव है जब पति और पत्नी दोनों ही काम-कला में पारंगत हों।

तत्कालीन समाज में राजकुमारियां, मंत्रियों तथा धनिकों की पुत्रियां कामशास्त्र में प्रवीण होती थीं और वेश्याएं तो यौन कला में दक्ष होती ही थीं। मध्यवर्गीय नारियां पूर्णतः अनभिज्ञ रहती थीं। अतः महर्षि ने यह प्रतिपादित किया कि प्रत्येक कन्या को विवाह के पूर्व यौन-कला के साथ ही इससे संबंधित सभी 64 कलाओं का ज्ञान एवं कौशल अर्जित कर लेना चाहिए। परन्तु यौन शिक्षा एकान्त में केवल उन्हीं अनुभवी नारियों से लेनी चाहिए जो इसमें माहिर हों। इस कार्य के लिए उन्होंने निम्नलिखित व्यक्तियों के माध्यम से यौन कला सीखने की अनुशंसा की है-
1. दाई की कन्या (जिसे संभोग का व्यवहारिक ज्ञान एवं अनुभव हो)
2. अंतरंग और विशवस्त सहेली
3. अपनी हमउम्र मौसी
4. बूढ़ी चरित्रवान दासी
5. विश्वसनीय भिक्षुणी
6. बड़ी बहन (विवाहिता)
काम कला से संबंधित होने के कारण महर्षि ने नारियों के लिए निम्नलिखित 64 कलाएं निर्धारित की हैं जिनसे उनके जीवन में निरन्तर रसवर्षा होती है-
1. गायन
2. वादन (कोई भी वाद्य)
3. नृत्य
4. चित्रकारी
5. माथे पर बिन्दी-सज्जा
6. रंगोली
7. बिस्तर तथा कमरों में पुष्प सज्जा
8. शारीरिक अंगों- नेत्र, होंठ, केश, नाखून, तथा पैरों को रंग-रोगन से आकर्षक बनाना
9. फर्श की सजावट (पुष्प तथा अन्य वस्तुओं से)
10. मौसम के अनुसार बिस्तर की सजावट
11. जल क्रीड़ा की विधाएं
12. यंत्र, तंत्र, मंत्र आदि का व्यवहारिक ज्ञान
13. पुष्पों के आभूषण तैयार करना
14. विभिन्न प्रकार की पुष्प मालाएं बनाना
15. विभिन्न प्रकार के वस्त्र धारण करने की कला
16. कर्ण सजाने की कला (पुष्पों एवं आभूषणों से)
17. सुगंधियों का प्योग (इत्र आदि का उचित प्रयोग)
18. आभूषण धारण करने की कला
19. जादू के करिश्मे दिखाना
20. सौन्दर्यवर्धन की कला (लाली, पावडर आदि से रूप सज्जा)
21. हस्त कौशल (दस्तकारी, कढ़ाई-बुनाई)
22. व्यंजन कला (भोजन बनाने की विधा)
23. शर्बत, आचार, चटनी, मुरब्बा आदि तैयार करने की कला (मिष्ठान कला)
24. वस्त्र तैयार करने की कला (दर्जीगिरी)
25. वीणा आदि यंत्र बनाने की कला
26. कपड़े पर विविध दृश्य एवं पशु-पक्षियों के चित्र कढ़ाई की कला
27. पहेलियां बूझने का कौशल
28. अन्त्याक्षरी में दक्षता
29. सुन्दर वाक्य रचना की कला
30. काव्य वाचन की कला
31. नाटकों की समीक्षा में दक्षता
32. समस्या-पूर्ति का कौशल
33. चटाई, आसन आदि बुनने की कला
34. लकड़ी पर नक्काशी में दक्षता
35. बढ़ईगिरी का सामान्य ज्ञान
36. वास्तिविदता का ज्ञान (Architecture)
37. धातुओं एवं आभूषणों को चमकाने की कला
38. रत्न, मणि आदि जवाहरातों को परखने की कला
39. उद्यान-वाटिका की व्यवहारिक कला
40. पशु-पक्षियों की मनोरंजनार्थ लड़ाई की कला
41. विविध धातुओं की पहचान
42. तोता मैना को बोलने तथा गाने का प्रशिक्षण
43. उबटन लगाने तथा मालिश करने की कला
44. उंगलियों के इशारे से सांकेतिक संप्रेषण (मनोभाव व्यक्त करना)
45. सांकेतिक लिपि द्वारा गोपनीय संदेश भेजने की कला
46. अन्य प्रदेशों की भाषा एवं बोलियों को समझने की कला
47. फूलों की गाड़ी बनाने की क्षमता
48. शुभ एवं अशुभ शकुनों को समझने की कला
49. वाहन तथा यन्त्रों के कल-पुर्जों की जानकारी
50. विशेष अंदाज़ में पढ़ने की कला
51. स्मरण शक्ति विकसित करने की कला
52. कविता रचना एवं वाचन की क्षमता एवं कौशल
53. शब्दकोष के उपयोग की कला
54. अलंकारों के समुचित प्रयोग की दक्षताः रस छन्द के ज्ञान सहित
55. बहुरूप धारण करने की कला
56. आकर्षक एवं सम्मोहक ढंग से वस्त्र धारण करने की कला
57. मनोरंजनार्थ जुआ खैलने का कौशल
58. हास परिहास एवं विनोद की कला
59. शतरंज आदि खेलने की क्षमता
60. गुड़िया तथा खिलौने बनाने की कला
61. सरल एवं सुलभ व्यायाम करने का कौशल
62. व्यवहार-कौशल
63. विजय प्राप्त करने के रहस्यों से परिचित होना
64. चेहरे के भाव पढ़ने तथा समझने की कला।

महर्षि वात्स्यायन के मतानुसार उक्त सभी चौंसठ कलाओं में दक्ष एवं पारंगत वीरांगना कामी पुरुषों को क्षण-मात्र में आकर्षित एवं सम्मोहित कर लेती है।

महर्षि के युग में इन कलाओं से युक्त वेश्या को गणिका के पद से सुशोभित किया जाता था, उन्हें समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी। ऐसी गणिका को राजसम्मान एवं राजश्रय भी प्राप्त होता था। गुणीजन उसकी प्रशंसा करते थे। कला-प्रेमी उससे प्रशिक्षण प्राप्त कर गौरवान्वित होते थे। सामान्यजन उसके प्रशंसक होते थे। उसे 64 कलाओं का मर्मज्ञ माना जाता था। लोग उसकी कृपा दृष्टि के लिए लालायित रहते थे।

इसी प्रसंग में महर्षि यह भी कहते हैं कि इन कलाओं में पारंगत राजकुमारियां तथा सामन्त कन्याएं अपने बहुगामी पति को भी सरलतापूर्वक अपने वश में कर लेती हैं। महर्षि का यह स्पष्ट संकेत है कि यदि स्त्री 64 कलाओं में पारंगत है तो उसका पति उसके सम्मोहन में सदा आबद्ध रहेगा। वह अपनी प्रिया के प्रति आजीवन निष्ठावान एवं समर्पित रहेगा। अन्य रूपवति नारियों के सम्मोहन से वह सदा मुक्त रहेगा क्योंकि उसकी प्रिया उसे पूर्ण यौन सन्तुष्टि प्दान करने में सक्षम होती है। अतः चिर-नूतन दाम्पत्य प्रेम के लिए 64 कलाओं में पारंगत होना हर स्त्री के लिए महर्षि ने आवश्यक माना है।

2 comments:

Rajey Sha said...

बधाई आपने ब्‍लॉग पर चौसठ कलाएं प्रदरशि‍त कीं।

Mahesh kumar said...

sabhi kalaye vaybharik hai.jis Nari me ye kalaye hoge vo sarvang sundari hagi hi.