Monday, January 04, 2010

भूमिका

महर्षि वात्स्यायन का कामसूत्र विश्व की प्रथम यौन संहिता है जिसमें यौन प्रेम के मनोशारीरिक सिद्धान्तों तथा प्रयोग की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना की गई है। यौन प्रेम का इतना प्रमाणिक एवं व्यवहारिक ग्रन्थ कहीं अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। अर्थ के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है। अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि का काल निर्धारण नहीं हो पाया है। परन्तु अनेक विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार महर्षि ने अपने विश्वविख्यात ग्रन्थ कामसूत्र की रचना ईसा की तृतीय शताब्दी के मध्य में की होगी। तदनुसार विगत सत्रह शताब्दिओं से कामसूत्र का वर्चस्व समस्त संसार में छाया रहा है और आज भी कायम है। संसार की हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है। इसके अनेक भाष्य एवं संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं। वैसे इस ग्रन्थ के जंगमंगला भाष्य को ही प्रमाणिक माना गया है। कोई दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद सर रिचर्ड एफ़ बर्टन (Sir Richard F. Burton) ने जब ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया तो चारों ओर तहलका मच गया और इसकी एक-एक प्रति 100 से 150 पौंड तक में बिकी। अरब के विख्यात कामशास्त्र ‘सुगन्धित बाग’ (Perfumed Garden) पर भी इस ग्रन्थ की अमिट छाप है।

महर्षि का वास्तविक नाम है मल्मनाग। वात्यायन या तो उनका गोत्र है अथवा साहित्यिक उपनाम। परन्तु उनकी ख्याति वात्यायन के नाम से ही है। यथार्थ में वात्यायन एवं कामसूत्र एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। कामसूत्र के उच्चारण मात्र से वात्यायन का एवं वात्यायन के उल्लेख मात्र से कामसूत्र का बोध होता है। महर्षि के कामसूत्र ने न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी संपदित किया है। राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी तथा खाजुराहो, कोणार्क आदि की जीवन्त शिल्पकला भी कामसूत्र से अनुप्राणित है। रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मननोहारी झांकियां प्रस्तुत की हैं तो गीत गोविन्द के अमर गायक जयदेव ने अपनी लघु पुस्तिका ‘रति-मंजरी’ में कामसूत्र का सार संक्षेप प्रस्तुत कर अपने काव्य कौशल का अद्भुत परिचय दिया है।
काम की व्याख्या महर्षि ने अद्भुत सूझबूझ से की है। व्याख्या द्वि-आयामी है। प्रथम सामान्य एवं द्वितीय विशेष। सामान्य के अन्तर्गत पंचेन्द्रिओं द्वारा प्राप्त होने वाले आनन्द एवं रोमांच का समावेश किया गया है जिसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध मन एवं चेतना से जुड़ा हुआ है। इन्हीं के द्वारा मनोशारीरिक क्रिया एवं प्रतिक्रिया का संचालन होता है।

विशेष के अन्तर्गत स्पर्शेन्द्रिओं की भूमिका प्रतिपादित की गई है। शिश्न और योनि अत्यन्त संवेदनशील स्पर्शेन्द्रिआं हैं। इन्हीं का पारस्परिक मिलन एवं घर्षण सम्भोग है जिसकी अन्तिम परिणति चरमोत्कर्ष (Climax) एवं स्खलन (Ejaculation) में होती है।

पंचेन्द्रिओं की भूमिका यौन क्रीड़ा के समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। प्रत्येक इन्द्री से एक विशेष प्रकार के रोमांच और आनन्द की अनुभूति होती है। नेत्र, कर्ण, त्वचा, जिव्हा तथा नासिका का प्रत्यक्ष सम्बन्ध क्रमशः दृश्य, ध्वनि, स्पर्श, स्वाद एवं गन्ध से होता है। अन्य अवसरों पर इनकी भूमिका अलग अलग होती है। मनोरम दृश्य से नेत्र, मधुर ध्वनि से कर्ण, सुखद स्पर्श से त्वचा, स्वाद से जिव्हा तथा सुगन्ध से नासिका की तृप्ति होती है। स्वतन्त्र होकर भी ये सभी इन्द्रियां एक-दूसरे की परिपूरक हैं। यौन क्रीड़ा के समय ये सभी इन्द्रियां एक साथ सक्रिय होकर अकल्पित रोमांच, सनसनी एवं आनन्द का संचार करती हैं। इन्ही की जागृति एवं क्रियाशीलता से प्रेमी युगल कामोन्मक्त होकर आनन्द के सर्वोच्च शिखर की ओर अग्रसर होते हैं।

महर्षि ने दाम्पत्य उल्लास एवं संतृप्ति के लिए यौन-क्रीड़ा को आधार माना है। दाम्पत्य जीवन में उल्लास एवं उमंग का संचार तभी होता है जब पति पत्नी दोनों में मासिक तालमेल हो, दोनों एक दूसरे के परिपूरक बनने का प्रयास करें तथा यौन क्रीड़ा के समय पारस्परिक सहयोग करें और अपने अपने लक्ष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ निरन्तर आगे बढ़ते रहें। दाम्पत्य जीवन में सतत रसवर्षा के लिए ही महर्षि ने अपने कामसूत्र में यौन प्रेम के रहस्यों का उद्घाटन किया है एवं यौन क्रीड़ा तथा तकनीक का सूक्ष्म तथा विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है।

काम एक अत्यन्त शक्तिशाली मूल प्रवृत्ति (Instinct) है। काम ही जीवन का संपदन, जीवन का उद्गम, उसके अस्तित्व तथा उसकी गतिशीलता तथा नर-नारी के पारस्परिक अकर्षण एवं सम्मोहन का रहस्य है। वास्तव में काम ही विवाह एवं दाम्पत्य सुख-शांति की आधारशिला है। काम का सम्मोहन ही नर-नारी को वाविह-सूत्र में आबद्ध करता है। अतः विवाहित जीवन में आनन्द की निरन्तर रस-वर्षा करते रहना ही कामसूत्र का वास्तविक उद्देश्य है।

कामसूत्रकार ने यौन-क्रीड़ा के प्रत्येक पक्ष एवं तकनीक का विश्लेषण एवं वर्णन करते हुए मनोशारीरिक प्रतिक्रियाओं की जो विवेचना प्रस्तुत की है वह आश्चर्यजनक है। यौन क्रीड़ा की विधियां अनेक हैं पर यह आवश्यक नहीं कि जो विधि एक युगल के लिए उपयुक्त हो वह दूसरे के लिए भी समान रूप से उपयोगी एवं प्रभावी हो। प्रत्येक प्रेमी-प्रेमिका की मनोशारीरिक रचना में परस्पर भिन्नता होती है। रुचियां भी भिन्न होती हैं। अतः शास्त्र में जो कुछ भी लिखा है उसे आँखें मूंदकर अपनाना और प्रयोग करना न तो उचित है और न ही वांछनीय। अतः महर्षि ने सपष्ट शब्दों में प्रेमी युगलों को आगाह किया है कि वे यौन क्रीड़ा के समय केवल उन्हीं तरीकों को अपनाएं जो दोनों को पसन्द, रुचिकर एवं आनन्दवर्धक हों। पारस्परिक सहमति एवं क्रियात्मक सहयोग से ही इन्द्रधनुषी आनन्द रोमांच की अनुभूति हो सकती है।

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