Monday, January 04, 2010

कामसूत्र का उद्भव

भारतिय जीवन दर्शन में काम की भूमिका एवं उसके महत्व को सहज भाव से स्वीकारा गया है। उसे न तो गोपनीय रखा गया और न ही वर्जित करार दिया गया। हमारे प्राचीन मनीषियों ने काम को एक प्रेरक एवं रचनात्मक शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया। अन्य विषयों की तरह काम-शास्त्र के भी अध्ययन एवं मनन की व्याख्या की गई है। परन्तु निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि कामशास्त्र की रचना कब और किसने की।
ऋतियों और पुराणों के अनुसार भगवान शिव के प्रतिभावन शिष्य नन्दी ने सर्वप्रथम कामशास्त्र की रचना की जिसमें एक हज़ार अध्यायों का समावेश था। ग्रन्थ अधिक विस्तृत होने के कारण आचार्य श्वेतकेतु ने इसका संक्षेपण किया, फिर भी ग्रन्थ काफ़ी बड़ा था। अतः आगे चलकर महर्षि बाभ्रव्य ने ग्रन्थ का पुनः संक्षेपण कर चुने हुए एक सौ पचास अध्यायों में सीमित एवं व्यवस्थित कर उसे जनोपयोगी बनाने का सार्थक प्रयास किया। इसे सात अधिकरणों में विभाजित किया गया।
1. सामान्य वर्णन
2. साम्प्रायोगिक (नर-नारी यौन क्रीड़ा)
3. परिणय हेतु योग्य वधु का चयन
4. पत्नी से अपेक्षित व्यवहार
5. अन्य नारियों से यौन सम्बन्ध
6. वेश्याओं से सम्पर्क
7. रूप सज्जा एवं सौन्दर्य अभिवृद्धि
महर्षि ब्राभव्य के ग्रन्थ से तत्कालीन विद्वान इतने अधिक प्रभावित हुए कि प्रत्येक अधिकरण पर एक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना कर डाली गई। परन्तु सामान्य जन के लिए ये ग्रन्थ बोझिल हो गए। अतः इन सभी ग्रन्थों का सार्थक सार संक्षेप में प्रस्तुत किया महर्षि वात्सयायन ने अपनी विश्व विख्यात रचना ‘कामसूत्र’ में। इस परम जनोपयोगी ग्रन्थ की रचना कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता। फिर भी अनेक विद्वानों के अनुसार इसकी रचना आज से कोई तेरह सौ वर्ष पूर्व की गई थी।
महर्षि ब्राभव्य के ग्रन्थ को आधार मानकर महर्षि वात्स्यायन ने भी लोकोपकारी ग्रन्थ कामसूत्र की रचना मनोवैज्ञानिक आधार पर की जिसमें 7 अधिकरण, 36 अध्याय तथा 67 प्रकरणों का समावेश किया गया है। श्लोकों की कुल संख्या 1250 है। विवरण निम्नानुसार हैः—
पहला–सामान्य अधिकरण–पांच अध्याय और पांच प्रकरण
दूसरा–साम्प्रायोगिक अधिकरण–दस अध्याय और सत्रह प्रकरण
तीसरा–कन्या सम्प्रयुक्त अधिकरण–पांच अध्याय और नौ प्रकरण
चौथा–भार्याधिकारिक अधिकरण–दो अध्याय और आठ प्रकरण
पांचवां–पारदारिक अधिकरण–छः अध्याय और दस प्रकरण
छठवां–वैशिक अधिकरण–छः अध्याय और बारह प्रकरण
सातवां–औपनिषदिक अधिकरण–दो अध्याय और छः प्रकरण
प्रत्येक अधिकरण एवं अध्याय एक दूसरे से श्रृंखलाबद्ध हैं। स्वतन्त्र होकर भी संलग्न हैं। प्रत्येक अध्याय का अपना विशिष्ट महत्व है, अतः सफ़ल सन्तुष्ट एवं उल्लासपूर्ण दाम्पत्य जीवन के लिए ग्रन्थ का आद्योपान्त सूक्ष्म अध्ययन एवं मनन करना तथा महर्षि के निर्देशानुसार यौन-व्यवहार करना प्रत्येक प्रेमी युगल का पावन कर्तव्य है।

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